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Talk to Salesभारतीय-अमेरिकी मीडिया की छलांग
शीतल नास्ता
जैसे-जैसे भारतीय समाचारों और संस्कृति के बारे में जानने की इच्छा बढ़ती जा रही है, भारतीय अमेरिकी मीडिया भी तेज़ी से विकास कर रहा है। संवाद समितियों के आलेखों वाले सामुदायिक समाचारपत्रों के अलावा खास वर्ग के लिए चमक-धमक वाली पत्रिकाएं भी निकाली जा रही हैं।
ज हां एक ओर अमेरिकी अखबार अपने हिसाब-किताब पर नए सिरे से विचार कर रहे हैं, संपादकों और संवाददाताओं को बाहर का रास्ता दिखाते हुए भविष्य के ऑनलाइन सूचना युग में अपने अस्तित्व को लेकर चिंता में डूबे हैं, वहीं भारतीय-अमेरिकी और अन्य जातीय समूहों के लिए छपने वाले प्रकाशनों की संख्या बढ़ रही है। जातीय समुदाय फलफूल रहे हैं और विज्ञापनदाता अमेरिका के सबसे अधिक तेजी से बढ़ रहे जनसंख्या समूहों की क्रयक्षमता पर कब्जा जमाने के लिए वैकल्पिक रणनीतियों पर विचार कर रहे हैं।
पिछले दो दशकों में भारतीय-अमेरिकी पाठकों के लिए ढेरों समाचार साप्ताहिक और आकर्षक सचित्र पत्रिकाओं का प्रकाशन प्रारंभ हुआ है। आप्रवासी भारतीयों और एशियाई मूल के अन्य अमेरिकावासियों के लिए सूचनाएं उपलब्ध करवानेवाली वेबसाइट www.garamchai.com पर इस तरह के करीब 35 ऑनलाइन और अन्य प्रकाशनों की सूची मौजूद है। भारतीय समाचारों और संस्कृति की प्यास बढ़ने के साथ-साथ भारतीय-अमेरिकी मीडिया के स्वरूप में भी बदलाव आया है।
वर्ष 2004 में प्रारम्भ हुई ऑनलाइन पत्रिका
इंडियन लाइफ एंड स्टाइल मैगज़ीन की ऑनलाइन संपादक डायना रोहिणी लाविन कहती हैं, “मुझे लगता है कि हर महीने बढ़ती संख्या में भारतीय अखबार और पत्रिकाएं बाज़ार में आने की घोषणा करते हैं, और उतने ही प्रकाशन बंद भी होते हैं, या व्यवसाय का तरीका बदलते हैं।” 33 वर्षीय डायना बोस्टन, मैसाच्यूसेट्स में जन्मी अमेरिकी हैं लेकिन उनका कहना है कि करीब 11-12 साल पहले वह अपने ‘भारतीय आत्म’ को जान पाईं। भारतीय संस्कृति में डूबी डायना के पति उत्तर भारतीय हैं। वह ढेरों दक्षिण एशियाई प्रकाशनों के लिए लिखती रही हैं।
अमेरिकी जातीय मीडिया संगठनों के सहकारी प्रयास न्यू कैलिफोर्निया मीडिया (जिसे अब न्यू अमेरिका मीडिया कहा जाता है) के वर्ष 2005 के अध्ययन के अनुसार जातीय उपभोक्ताओं तक पहुंचने का सबसे अच्छा साधन जातीय मीडिया संगठन है। अध्ययन से पता चला कि इस समूह के वयस्कों में से 45 प्रतिशत मुख्यधारा प्रकाशनों की जगह जातीय प्रकाशनों को पसंद करते हैं। अधिक स्पष्टता से कहा जाए तो 25 प्रतिशत एशियाई अमेरिकी मुख्यधारा प्रकाशनों की जगह जातीय प्रकाशनों को पसंद करते हैं और एशियाई भारतीयों, फिलिपीनियों और जापानियों सहित इस समूह
भारतीय समाचारों और संस्कृति पर आधारित अमेरिकी प्रकाशनों में से एक इंडियन लाइफ़ एंड स्टाइल के हाल ही में प्रकाशित कुछ अंक।
के वयस्कों में से आधे से अधिक हर महीने कुछेक बार तो जातीय समाचारपत्र पढ़ते ही हैं।
1987 में ह्यस्टन, टेक्सास से प्रकाशित हो रहे अंग्रेजी समाचार साप्ताहिक वॉयस ऑफ एशिया के संस्थापक-प्रकाशक कोशी थॉमस कहते हैं, “भारतीय, चीनी, वियतनामी, पाकिस्तानी और अन्य सभी जातीय समाचार माध्यम मुख्यधारा समाचार माध्यमों से बेहतर ढंग से फलफूल रहे हैं। पिछले कुछ सालों में इंटरनेट और प्रसारण माध्यमों के कारण मुख्यधारा समाचारपत्रों की प्रसार संख्या में कमी आई है या वह जहां की तहां
ठहर गई है। दूसरी ओर जातीय समाचारपत्रों की संख्या और प्रसार संख्या में वृद्धि हुई है और अगर वे नए तौरतरीके अपनाते रहे तो और भी बढ़ेगी।”
आव्रजन और जातीय जनसंख्या समूहों के आंकड़ों पर एक निगाह डालते ही स्पष्ट हो जाता है कि भारतीय अमेरिकियों के पसंदीदा संचार माध्यमों की चिंता क्यों की जा रही है। वर्ष 2000 की जनगणना के बाद से भारतीय-अमेरिकियों को ‘अमेरिका का सबसे धनी जातीय समूह’ माना जा रहा है। इस जनगणना के अनुसार अमेरिका में एशियाई भारतीय प्रति परिवार पूरी जनसंख्या की
तुलना में औसतन 51.6 प्रतिशत अधिक कमाते हैं। लेकिन इसके अलावा भी भारत और भारतीय संस्कृति में अमेरिका की रुचि बढ़ी है और यह रुचि हिप्पी घाघरों और अगरबत्तियों तक ही सीमित नहीं है, कॉरपोरेट आर्थिक स्वतंत्रता में भी है।
डायना कहती हैं, “मुझे लगता है कि आज हर कोई भारत की खबर चाहता है, बीते दशक में भारत ने दिखा दिया है कि वह वैश्विक स्तर पर दूसरे देशों से प्रतिस्पर्धा कर सकता है। माइक्रोसॉफ़्ट जैसे बड़े उद्योग भी प्रौद्योगिकी के
फोटोग्राफी: राहुल शर्मा
मीडिया
22 स्पैन जुलाई/अगस्त 2007
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